सनातन संस्कृति के सबसे प्राचीन धर्मग्रंथ वेद है, जो भारतीय सभ्यता का पवित्र साहित्य हैं। यह हिन्दुओं का पूजनीय और आधारभूत धर्मग्रन्थ भी हैं। वेदो को इस सृष्टि का सबसे प्राचीन साहित्य भी माना जाता हैं। वेदो के संकलनकर्ता महर्षि कृष्ण द्वैपायन भगवान वेदव्यास को माना जाता है। 

वेद कितने है, और इनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

वेद कितने है, और इनकी उत्पत्ति कैसे हुई?  


इस सृष्टि की सर्वोत्तम वस्तु ज्ञान है। ज्ञान के द्वारा ही हम जीवन के विस्तार को समझ सकते है। जब ईश्वर ने सृष्टि निर्माण का संकल्प लिया तो उनकी प्रेरणा से सर्वप्रथम ब्रह्माजी प्रगट हुऐ, जिन्हे ब्रह्मांड की उत्पति और सृजन का कार्य दिया गया। ब्रह्माजी ने कई हजार वर्षों तक परमेश्वर की आराधना की, उनकी तपस्या के फल स्वरूप ईश्वर ने उन्हे ज्ञान प्रदान किया। 

इसलिए सर्वप्रथम जो ज्ञान ब्रह्माजी की के मुख से प्रगट हुआ वही वेद के रूप मे परिवर्तित हो गया। इस लिए वेदों को ब्रह्मवाणी कहां जाता है। वेदों की उत्पति कब हुई इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। इस ज्ञान को सप्त ऋषियों ने ब्रह्माजी से प्राप्त किया और उनसे अन्य ऋषियो को प्राप्त हुआ। समय-समय पर ऋषियों ने इस ज्ञान को साधारण मनुष्यों तक पहुंचाने के लिए कलमबद्ध किया। इसलिए वेद कब लिखे गए इसका कोई स्पष्ट आकलन नहीं है। 

द्वापर युग के अंत मे महऋषि वेदव्यास ने सभी वेदों और पुराणों के विस्तारित स्वरूप को संक्षिप्त रूप प्रदान किया, ताकि साधारण मनुष्य के लिए उसका अध्यन करना सरल हो जाए। इसीलिए आधुनिक शोधकर्त्ता वेदों की आयु लगभग 6000 B.C मानते है। जबकि वास्तव मे यह उसके संक्षिप्त किये जाने का समय है, वेद तो उससे कही अधिक पुराने है, इसलिए कोई भी वेदों की आयु का प्रमाण नहीं दे सकता।


संसार मे उपस्थित सभी धर्म ग्रन्थ मानव जीवन की उत्पति के बाद रचे गये, परंतु सनातन वेद तो मानव की उत्पति से पहले ही प्रगट हो गये थे। इसलिए हम वेदों को समस्त धार्मिक ग्रंथो का आधार भी मान सकते है। वेदों मे समाहित ज्ञान को चार भागों मे विभाजित किया गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। इनमे ऋग्वेद को प्रथम वेद का स्थान दिया गया है। 

ईश्वर द्वारा प्राप्त ज्ञान जो मानव जीवन को विकसित करता है, उसे समान रूप से इनमे समाहित किया है। सनातन संस्कृति मे वेदों को सर्वोत्तम स्थान दिया गया है। सामान्य भाषा में भी वेद का अर्थ "ज्ञान" ही है। वास्तव मे ज्ञान ही वह प्रकाश है जो मनुष्य के मन मे अज्ञान-रूपी अन्धकार को नष्ट कर देता है।

प्रमुख भारतीय विद्वानों के मत -
  • श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती - स्वामी दयानन्द सरस्वती का मत है कि वेदों की उत्पत्ति सृष्टि के आदि में हुई है। वेदों की उत्पत्ति ईश्वर से हुई है। श्री रघुनन्दन शर्मा भी इस मत के समर्थक हैं।
  • श्री बालगंगाधर तिलक - उन्होंने ज्योतिष को आधार मानकर ऋग्वेद की रचना को 6000 ईसा पूर्व से 4000 ईसा पूर्व तक माना है। बाल गंगाधर तिलक की राय भारतीय और पश्चिमी विद्वानों के अनुरूप है। वह 4000 ईसा पूर्व में वेदों की रचना पर विचार करने पर बल दिया।
  • श्री शंकर बालकृष्ण दीक्षित - 3500 ईसा पूर्व में वेदों की रचना माना है।
  • श्री अविनाश चंद्र दास - एक मंत्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने वेदों की रचना को 25000 ईसा पूर्व माना है। मंत्र इस प्रकार है - "एक चेत सरस्वती नदी नाम" (ऋग्वेद - 7/92/2)
  • पंडित दीनानाथ शास्त्री ने अपनी पुस्तक "वेद काल नियान" में तीन लाख वर्ष पूर्व वेदों की रचना पर विचार किया है।
  • डॉ. आर. जी भंडारकर - उन्होंने 600 ईसा पूर्व में वेदों की रचना को माना है। 
पश्चिमी विद्वानों की राय 

  • विन्टर निट्स - उन्होंने अपनी समन्वय राय दी कि वैदिक काल 2500 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व का है। उन्होंने ऋग्वेद का समय 2500 ईसा पूर्व माना है।
  • मैकडॉनेल – 2000 ईसा पूर्व से 1200 ईसा पूर्व माना है।
  • कीथ - उन्होंने 1200 ईसा पूर्व में वेदों की रचना को माना है।
  • मैक्स मूलर - उन्होंने बुद्ध को वैदिक साहित्य का आधार बनाया, जो 1200 ईसा पूर्व का समय था। 

प्रमुख भारतीय और पश्चिमी विद्वानों के वेदों के निर्माण के समय के संबंध में अलग-अलग मत हैं। जहाँ स्वामी दयानन्द ने वेदों को अपौरुषेय अर्थात ईश्वर से उत्पन्न माना है वही बालगंगाधर तिलक ने ६००० ईसा पूर्व वेदों को माना है। ४००० ईसा पूर्व तक ऐसा माना जाता है कि वेदों के निर्माण के समय के संबंध में विचार के दो स्कूल हैं। प्रथम विचार धारा के लोगों का मानना ​​है कि वेदों का निर्माण काल ​​सृष्टि के आदि से है। वेद ईश्वर के वचन हैं। इसे समय पर नहीं बांधा जा सकता। दूसरे यह नहीं मानते कि वेद ईश्वर के वचन हैं। वे 10000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व से के बीच वैदिक काल निर्धारित करते है।  


वेद पुरातन ज्ञान-विज्ञान का अथाह भंडार है। इसमें मानव की हर समस्या का समाधान समाहित है। वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है। 

वेदों को अनेक उपवेदो में भी विभक्त किया गया है। ऋग्वेद को आयुर्वेद, यजुर्वेद को धनुर्वेद, सामवेद को गंधर्ववेद और अथर्ववेद को स्थापत्यवेद, में बाटा गया है। वेदों के चार विभाग है: ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़। जिसमे ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई है। 

वेदों के प्रकार 


ऋग्वेद: ऋग्वेद को प्रथम वेद की उपाधि प्राप्त है। इसे पद्य शैली (कविता के रूप में) लिखा गया है। ऋग्वेद में 10 मंडल, 1028 सूक्त, 10580 ऋचाये हैं। ऋग्वेद: ऋक शब्द रूप से बना है जिसका अर्थ 'ज्ञान और स्थिति' का दर्शन है। इस ग्रंथ में सभी देवताओं के आवाहन मंत्र,  देवलोक में उनकी स्थिति और कार्य के बारे में बताया गया है।


इसके साथ ही ऋग्वेद में हवन चिकित्सा, जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, मानस चिकित्सा की जानकारी भी दी गई है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त की जानकारी भी मिलती है, जिसमें सभी प्रकार की प्राकृतिक दवाओं के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसमें 125 प्रकार की दिव्य औषधियों के बारे में भी बताया गया है, जो इस पृथ्वी पर 107 स्थानों मे पाई जाती हैं। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा अवस्था प्राप्त करने की कथा को भी सम्मलित किया गया है।

यजुर्वेद: यजुर्वेद  शब्द यत् + जु = यजु से मिलकर बना है। यत का अर्थ 'गतिशील' और जु का अर्थ 'आकाश' होता है। इसलिए यजुर्वेद का अर्थ आकाश में निरंतर गतिशील होने से है। इसमें श्रेष्ठ कर्म करने पर बल दिया गया है। यजुर्वेद में यज्ञ करने की विभिन्न प्रकार विधियों और उनके प्रयोगो के बारे में बताया गया है। इसमे तत्व विज्ञान के बारे में भी बताया गया है। 

ब्राह्मण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ इनका विस्तार पूर्ण ज्ञान इसी वेद मे मिलता है। इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें सम्मलित है।यजुर्वेद की दो महत्वपूर्ण शाखाएं हैं- कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत में और शुक्ल यजुर्वेद उत्तर भारत में प्रचलित है। यजुर्वेद में कुल 18 कांड और 3988 मंत्र हैं। 'गायत्री मन्त्र' और 'महामृत्युंजय मन्त्र' का मुख्य स्रोत्र भी यजुर्वेद को ही माना गया है। 


सामवेद: सामवेद साम शब्द से बना है इसका अर्थ रूपांतरण, संगीत, सौम्यता और उपासना होता है।सामवेद में ऋग्वेद की रचनाओं को संगीतमय रूप में प्रस्तुत किया गया है। सामवेद को गीतात्मक (गीतों के रूप में) लिखा गया है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। गीता उपदेश के समय भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं को सामवेद की संज्ञा दी थी। इसमें 1824 मंत्र हैं जिसमें इंद्र, सविता, अग्नि जैसे देवताओं का वर्णन है। सामवेद की 3 शाखाएं हैं। इसमें 75 ऋचाये हैं।


Veda Rigveda Yajurveda Samaveda Atharvaveda

अथर्ववेद: अथर्व शब्द थर्व + अथर्व शब्द से मिलकर बना है। थर्व का अर्थ 'कंपन' और अथर्व का अर्थ 'अकंपन' होता है।इसलिए ज्ञान के द्वारा श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। 

यही अथर्ववेद का मूल आधार है। इस वेद में रहस्यमई विद्याओं, चमत्कार, तांत्रिक मंत्रो, आयुर्वेद जड़ी बूटियों का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। इसमें कुल 20 अध्याय है, जिनमें 5687 मंत्र हैं। अथर्ववेद आठ खंड में विभाजित है। जिसमे भेषज वेद और धातु वेद ये दो नाम मिलते हैं।

वेदों का हमारे जीवन मे बहुत गहरा महत्व है। वेदों हमें विभिन्न प्रकार की जानकारियां प्रदान करते हैं। कुछ प्रमुख जानकारियां इस प्रकार हैं-  

वर्ण व आश्रम पद्धतियो की जानकारी


वेदों शास्त्रों में मनुष्य के चार पुरुषार्थो का वर्णन मिलता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इनमे धर्म के लिए प्रातः काल अर्थ के मध्य काल और काम के लिए रात्रि का विधान बताया गया है। इन तीनों पुरुषार्थो का पूर्ण पालन करने पर ही मनुष्य चौथे पुरुषार्थ मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

Veda Rigveda Yajurveda Samaveda Atharvaveda

इन चारों पुरुषार्थो मे भी धर्म को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। इसके अलावा तीन आश्रमों का वर्णन भी मिलता हैं। पहला आश्रम ब्रह्मचर्य माना गया है, जिसमें व्यक्ति उपनयन संस्कार (जनेऊ) को धारण करता है। ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्ति गुरु की सेवा और शिक्षा प्राप्त करता है। वह अपनी समस्त इच्छाओं और भावनाओं को अनुशासन में रखता है। 


वह गुरु के आश्रम में ही रहता है और गुरु की आज्ञा का पालन करता है। दूसरा आश्रम गृहस्थ आश्रम है। इसे मनुष्य के जीवन का महत्वपूर्ण चरण माना गया है। इसमें व्यक्ति विवाह करता है, और काम का सेवन करता है। वह संतान उत्पत्ति करता है और समाज के कर्तव्यों का पालन करता है। इसके बाद व्यक्ति वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता है, इसमें व परिवारिक कर्तव्यों का पालन कर मोह का त्याग कर देता है, और वन में जाकर सांसारिक विषयों से दूर हो ईश्वर भक्ति मे लीन हो जाता है।


रीति रिवाज व परंपराओं का वर्णन

चारों वेदों में सनातन धर्म के प्राचीन रीति रिवाज और परंपराओं का वर्णन भी मिलता है। आदर्श व्यवहार किस प्रकार का होना चाहिए इसका विस्तार पूर्वक वर्णन मिलता है। बुरे कर्मों का फल बुरा होता है और अच्छे कर्मों का फल अच्छा होता है, इसलिए व्यक्ति को धर्म के अनुसार ही जीवन जीना चाहिए। बुराइयों से हमेशा दूर रहना चाहिए और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। क्योकि जीवन के अंतिम लक्ष्य को मोक्ष ही माना गया है।

विभिन्न व्यवसायो का वर्णन

वेदों में योद्धा, पशुपालक, पुजारी, शिल्पकार, किसान जैसे व्यवसाय के बारे में भी वर्णन मिलता है। वेदों में चार प्रकार की वर्ण व्यवस्था का वर्णन मिलता है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। सामान्यतः एक भ्रामक प्रचार अत्यधिक प्रचलित है, की जन्म के आधार पर ही मनुष्य की जाति निश्चित हो जाती थी। 

इसलिए सभी जातियों के लिए के लिए अलग-अलग काम निर्धारित है। ब्राह्मणों का मुख्य काम वेदों का अध्ययन करना, यज्ञ करना, पुरोहित और पुजारी का काम करना, शिक्षक का काम करना है। क्षत्रियों का मुख्य काम युद्ध करना, लोगों की रक्षा करना है। वैश्य का मुख्य काम व्यापार करना, इसके अलावा पशुपालन, खेती, शिल्प और दूसरे व्यापारों भी वैश्य कर सकते है। शूद्रों का काम केवल सफाई करना है।

जबकि इसके विपरीत मनुस्मृति में स्पष्ट रूप से ये कहा गया है-

'जन्मना जायते शूद्रः
संस्कारात् भवेत् द्विजः।
वेद-पाठात् भवेत् विप्रः
ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।'

अर्थात:- ‘जन्म से सभी मनुष्य शुद्र उत्पन्न होते है, संस्कार ग्रहण करने से द्विज (ब्रह्मण) बनते है, वेदों के पठन-पाठन से विप्र बनते है, और जो ब्रह्म के वास्तविक अर्थ को समझ लेता है, वह ही असली ब्राह्मण कहलाता है।’

वेदों का निष्कर्ष 

इसलिए सनातन पद्धति मे जाति व्यवस्था के लिए कोई स्थान नहीं है, वो वर्ण व्यवस्था का समर्थन करती है। जिसमे सभी प्राणी अपनी क्षमताओं के आधार पर अपने व्यवसाय का स्वतंत्र चुनाव कर सकता है।

  

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