शिवा या महादेव कौन है, शिव का अस्तित्व क्या है, क्या ईश्वर का कोई अस्तित्व हो सकता है अगर नहीं तो उसे हम अनुभव भी नहीं कर सकते। मनुष्य की सरचना लौकिक और पारलौकिक दोनों अवस्थाओं का अनुभव कर सकती है बस उसके लिये योग्यता निर्धारित है। जो मनुष्य उस योग्यता को प्राप्त कर लेता है वो शिव के अस्तित्व को भी अनुभव कर लेता है।

महाशिवरात्रि और शिवरात्रि मे अंतर क्या है।

वैसे "शिव" का शाब्दिक अर्थ है "जो वास्तव मे नहीं है।" "और जो है," वही अस्तित्व और निर्माण है। “और जो नहीं है” वही शिव का वास्तविक रूप है। "यहाँ जो नहीं है" का अर्थ यही है, यदि आप अपनी आँखें खोलते हैं और चारों ओर देखते हैं, तो आपकी दृष्टि उन छोटी-छोटी चीजों की तरफ आकर्षित होती है जो अस्तित्व के रूप मे दिखाई देती है

इसके अतिरिक्त भी आप ऐसी बहुत सारी रचनाओ को देखोगे उनका अनुभव करोगे परन्तु वास्तव मे जो एक सबसे बड़ी चीज है, और जिसकी हमे तलाश है, उसी की और हमारी दृष्टि नहीं जाती। अगर आप ध्यान से देखेंगे कि उन अस्तित्व वाली चीजों के साथ जिसकी सबसे बड़ी उपस्थिति है वो है एक विशाल खालीपन जो अपने भीतर सभी अस्तित्वों को समाये हुऐ है, वही वास्तविकता मे शिव है। 

इस पृथिवी पर जितने भी धर्म है, यहाँ पर मौजूद हर संस्कृति हमेशा ही परमात्मा की सर्वव्यापी प्रकृति के बारे में ही बात करती रही है। अगर हम इसे इस प्रकार देखें, तो केवल एक चीज ही ऐसी है जो वास्तव में सर्वव्यापी हो सकती है और एकमात्र चीज जो हर जगह पर वयापक रूप मे हो सकती है वह है अंधकार, शून्यता या पूर्ण शून्यता। 


इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे भी ऐसी बहुत सी आकाशगंगाये हैं, जो आमतौर पर देखी जाती हैं, लेकिन जो विशाल खालीपन उन सब आकाशगंगाओं को धारण करता है वह हर किसी के ध्यान में नहीं आता, उसकी यह विशालता, यह अबाधित शून्यता ही है, जिसे शिव कहा जाता है। आज, आधुनिक विज्ञान भी यह साबित करता है कि सब कुछ, वास्तव मे कुछ नहीं से ही आता है और जो कुछ भी नहीं है, यह इस संदर्भ में है कि इस विशाल शून्यता या कुछ भी नहीं का महान स्वामी केवल शिव है या जिसे महादेव कहा जाता है।  

शिवरात्रि क्यों मानते है 

शिवरात्रि, महीने की सबसे गहरी काली रात्रि है। मासिक आधार पर शिवरात्रि और विशेष दिन महाशिवरात्रि का जश्न लगभग अंधेरे का ही उत्सव लगता है। अगर हम इसे सामान्य बुद्धि से समझे तो कोई भी तार्किक दिमाग अंधेरे का विरोध करेगा और स्वाभाविक रूप से प्रकाश का ही विकल्प चुनेगा। अब इसे थोड़ा और तार्किक करे तो प्रकाश का महत्व तो अंधेरे मे ही होता है, वो अंधकार ही उस प्रकाश को अस्तित्व प्रदान करता है। 

क्योकि शिव ही प्रकाश को स्वरूप प्रदान करते है, इसीलिये शिव रात्रि प्रकाश को अस्तित्व मे लाने की रात्रि है। यहाँ महाशिवरात्रि और शिवरात्रि इन दोनों का अलग अलग महत्व है। महाशिवरात्रि इस पर्व का आयोजन फरवरी-मार्च के महीने मे किया जाता है और शिवरात्रि इसका आयोजन सावन के महीने मे किया जय जाता है। इन दोनो मे क्या अंतर है।

महाशिवरात्रि का अर्थ 

महाशिवरात्रि जो फरवरी-मार्च के महीने मे मनाई जाती है उसके पीछे एक रोचक कहानी है। जब सदाशिव की आज्ञा से ब्रह्माजी को इस सृष्टि की रचना का कार्य दिया गया और भगवान विष्णु को सृष्टि पालन का भार दिया गया। परन्तु ब्रह्माजी सब तरह के प्रयत्न के पश्चात् भी वो ऐसी सृष्टि की रचना नहीं कर पाय जो अपना विस्तार कर सके तब उन्होने श्री विष्णु के परामर्श से भगवान सदाशिव की आराधना की


तब ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर सदाशिव जो ज्योति रूप मे प्रगट थे, उन्होने प्रथम बार अर्द्धनारीश्वर के रूप मे ब्रह्माजी के सामने अपना स्वरूप प्रगट किया। जिससे प्रथम बार ब्रह्माजी को पुरुष और प्रकृति (नारी) के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होने सृष्टि की रचना आरम्भ की। शिव के प्रथम बार अर्द्धनारीश्वर रूप मे प्रगट होने की रात्रि को ही महाशिवरात्रि कहा जाता है। जो इस सृष्टि की उत्पति का प्रतीक है।

शिवरात्रि का अर्थ 

शिवरात्रि जो सावन के महीने मे मनाई जाती है, वो शिव के देवताओं की प्राथना पर शंकर के रूप मे प्रथम बार कैलाश पर प्रगट होने के रूप मे मनाई जाती है जहां उनका माता शक्ति से पार्वती के रूप मे विवाह होता है। सावन मे आने वाली शिवरात्रि का एक अलग महत्व भी है, क्योकि सावन के महीने मे ही देवताओं और असुरों द्वारा समुंद्र मंथन किया गया था। 

जब मंथन से कालकूट विष निकला तो एक मात्र शिव ही थे, जिन्होने उसे ग्रहण कर अपने कंठ मे धारण कर नीलकंठ कहलाये। यही से ही सावन मे चलने वाली कावड़ यात्रा का प्रारम्भ हुआ। कालकूट विष को धारण करके शिव उसकी ज्वाला को शांत करने के लिये ऋषिकेश मे तपस्या करने लगे तब सर्वप्रथम परशुराम जी ने गंगा से जल ले जाकर भगवान शिव को समर्पित किया तभी से ही कावड़ यात्रा अपने अस्तित्व मे आई और गंगा जल ले जाकर शिव को अर्पित किया जाने लगा। 

महाशिवरात्रि और शिवरात्रि मे अंतर क्या है।

भील द्वारा शिवरात्रि पर शिव पूजन 

त्रेता युग में, 'भीला' नाम से एक शिकारी रहता था। वह बहुत क्रूर, अधीर और छोटे स्वभाव वाला व्यक्ति था। उसका एकमात्र काम हिरणों का शिकार करना और उनका मांस बेचना था। कभी-कभी वह बिना किसी कारण के शिकार भी करता रहता था। जिसके परिणामस्वरूप, उसने अपने जीवन में बहुत सारे पाप जमा कर लिए थे।

 

एक बार, शिकारी के घर में उसके परिवार के लिये कोई भोजन नहीं बचा है, तब भोजन के लिये वह शिकारी अपने धनुष और बाण के साथ वन में चला गया। वह पूरे दिन पूरे जंगल में घूमता रहा लेकिन उसे कोई भी जानवर नहीं मिला। थक-हारकर वह शिकारी जंगल के बीच स्थित एक तालाब पर पहुँच गया। 

उस शिकारी ने सोचा, मुझे इस तालाब के पास इंतजार करना चाहिए क्योंकि जब सूरज डूबेगा, तो सभी जानवर यहाँ पानी पीने आएंगे और फिर मैं आसानी से उनका शिकार कर लूंगा। तब वह कुछ पानी बर्तन मे लेकर पास के बेल के पेड़ पर चढ़ गया। उस पेड के नीचे एक शिवलिंग पत्तो मे छिपा हुआ था जिसका उसे ज्ञान नहीं था। 

धीरे-धीरे समय बीतने लगा और रात का प्रथम प्रहर शुरू हो गया तब शिकारी ने एक हिरण को तालाब के पास आते देखा। जैसे ही शिकारी ने निशाना साधा, उसका शरीर हिल गया जिससे कुछ पत्ते और कुछ पानी पेड़ के नीचे स्थित शिवलिंग पर गिर गया। आशुतोष महादेव शिव ने प्रसन्न होकर शिकारी से अनजाने मे समर्पित बेल पत्र और जल को स्वीकार कर लिया।

जब हिरण ने शिकारी को निशाना बनाते हुए देखा तो वह मानव आवाज में जोर से चिल्लाया, "हे शिकारी, तुम मुझे क्यों मार रहे हो?" हिरण की बात सुनकर शिकारी हैरान रह गया। शिकारी ने उत्तर दिया "मेरा परिवार घर पर भूख से मर रहा है। मैं तुम्हें मार डालूंगा और फिर मेरा परिवार तुम्हारे मांस से अपनी भूख को संतुष्ट कर सकेगा। 

हिरण ने उसने कहा, मुझे कुछ समय दे दो मे एक बार अपने परिवार से मिलना चाहता हु। प्रथम प्रहर की पूजा से उसके मन मे दया उत्पन हो गई और उसने उसे जाने दिया। इस तरह, रात का प्रथम प्रहर बीत गया, जिससे शिकारी का दिल घृणा और द्वेष से मुक्त हो गया।

रात का पहला पहर समाप्त हो गया था, तब हिरण के जाने के कुछ समय बाद, हिरण की पत्नी उसकी खोज में तालाब पर आई। हिरण को आते देख शिकारी खुशी में कांप उठा जिससे पेड़ हिल गया, और कुछ बेल के पत्ते व पानी नीचे शिवलिंग पर गिर गए। इस तरह, रात के दूसरे प्रहर में भी शिव पूजा अनजाने में पूरी हो गई। 


जब उस हिरणी ने उस शिकारी को निशाना लगाते हुए देखा तो वह रोने लगी और उसने शिकारी से कुछ समय मांगा ताकि वह अपने परिवार से एक बार मिल सके, हिरणी की बातें सुनकर शिकारी ने उस हिरणी को जाने दिया। इस तरह, रात का दूसरा प्रहार भी बीत गया। कुछ समय बाद, एक और हिरण तालाब के पास आता हुआ दिखाई दिया। वह पहले वाले हिरण की बहन थी जो अपने भाई और भाभी की तलाश में आई थी। 


इस बार शिकारी ने उस हिरणी को मारने का दृढ़ निश्चय किया, और जैसे ही तीर चलाने लगा, शाखा हिल गई और कुछ बेल के पत्ते और पानी नीचे शिवलिंग पर गिर गया और अनजाने में शिकारी ने रात के तीसरे प्रहर की भगवान शिव की पूजा भी पूर्ण हो गई। उस हिरणी ने जब पेड़ पर बैठे हुऐ शिकारी को देखा, तो उसने भी एक बार अपने परिवार से मिलने की अनुमति मांगी, शिकारी के ह्रदय मे शिव कृपा से पूर्ण दया उत्पन्न होने से उसने उस हिरणी को भी जाने दिया।

वापस हिरण के घर पर, एक-एक करके, तीनों हिरण पहुंचे और अपनी कहानियाँ साझा कीं। तब तीनो ने यह निश्चय किया की हमे अपने वचन का पालन करने के लिये शिकारी के पास जाना चाहिये। तीनों हिरणों ने फिर से उस तालाब की ओर चल दिये जहाँ वह शिकारी उत्सुकता से उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। तीन हिरणों को अपने पास वापस आते हुए, वह अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर सका, उसकी खुशी की कोई सीमा नहीं थी। 

इससे वह पेड़ पुनः हिल गया, और फिर कुछ बेल के पत्ते और कुछ पानी नीचे शिवलिंग पर गिर गया। इस तरह, शिकारी ने अनजाने में शिवरात्रि के चारों प्रहर की पूजा संपन्न हो गयी और उसके सभी पाप धुल गए, और उसे भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। अब, उसे तीन हिरणों को तालाब के पास आता देख उसका मन पश्चाताप से भर गया। उसने सोचा मैंने अपने पूरे जीवन में कितने जघन्य पाप किए हैं, अब मे इन जानवरों को नहीं मारूंगा। शिकारी ने तीनों हिरणों को अपने घर वापस जाने के लिए कहा और अपने पापों के लिए पश्चाताप करने लगा। उस समय, शिकारी का मन द्वेष से मुक्त हो गया था। 

महाशिवरात्रि और शिवरात्रि मे अंतर क्या है।

शिव द्वारा भील को वरदान 

तभी अचानक भगवान शिव शिवलिंग से निकले और उनके सामने प्रकट हो गए। भगवान शिव ने शिकारी से कहा, मैं तुम्हारी पूजा से प्रसन्न हूं। तुम रात के चार प्रहर में जागे हो और जल और बेल के पत्तों से मेरी पूजा की इसलिये जो भी वरदान चाहते हो मांग लो, मैं उसे प्रदान करूंगा। शिकारी ने कहा, हे भगवान आपके दर्शन प्राप्त करने पर ही मेरी सभी इच्छाएँ पूरी हुईं, अब मुझे और कुछ नहीं चाहिये। 


भगवान शिव शिकारी की बातें सुनकर मुस्कुराए और कहा, “हे भील, तुम अब से नीच गुणों से मुक्त हो अब तुम एक शुद्ध और प्रबुद्ध इंसान हो। तुम्हे मेरा आशीर्वाद है, अब से तुम्हे गुहा के नाम से जाना जाएगा और तुम एक राज्य के स्वामी होंगे। एक दिन, भगवान विष्णु के अवतार श्री राम तुम्हारे पास आएंगे तुम परम भक्ति से उनकी पूजा करना जिससे तुम्हे परम पद प्राप्त होगा। 

यह भगवान राम के मित्र गुहा की कहानी है। राम उन्हें 'परम प्रिय मित्र' के रूप में संबोधित करते थे। तीनों हिरणों ने भी वहाँ भगवान शिव के दर्शन प्राप्त किए, जहा वह अपना नश्वर शरीर छोड़ कर स्वर्ग को चले गए। उसी स्थान पर भगवान शिव स्थापित हो गए, जहां उन्हे व्याधेश्वर महादेव के रूप में जाना जाता है।

अंत मे निष्कर्ष 

प्रकाश को तार्किक दिमाग से देखे तो यह एक संक्षिप्त घटना है। प्रकाश कभी शाश्वत नहीं होता, यह हमेशा अपनी सीमित संभावना के साथ प्रगट होता है और फिर समाप्त हो जाता है। प्रकाश का सबसे बड़ा स्रोत जिसे हम जानते हैं वह केवल सूर्य है। यहां तक ​​कि सूरज की रोशनी को भी आप अपने हाथ से रोक सकते हैं। किंतु आप अंधेरे को नहीं रोक सकते हो क्योकि अंधेरा सर्वत्र व्याप्त है। 

दुनिया में अपरिपक़्व दिमाग ने हमेशा अंधेरे को शैतान के रूप में ही वर्णित किया है। लेकिन जब आप परमात्मा को सर्वव्यापी बताते हैं, तो आप स्पष्ट रूप से परमात्मा को भी अंधकार के रूप में संदर्भित करते हैं, क्योंकि केवल अंधकार ही वास्तव मे सर्वव्यापी है। यह हर जगह है और इसे किसी भी चीज के समर्थन की आवश्यकता नहीं है। परन्तु प्रकाश हमेशा एक स्रोत से आता है जो खुद को जला रहा है। 

इसकी एक शुरुआत और एक अंत है। यह हमेशा एक सीमित स्रोत से ही होता है। जबकि अंधेरे का कोई स्रोत नहीं होता यह स्वयं के लिए ही एक स्रोत है। यह सर्वत्र व्याप्त है, सर्वत्र है, और सर्वव्यापी है। इसलिए जब हम शिव कहते हैं, तो वास्तव मे वह उस अस्तित्व का विशाल खालीपन ही होता है। यही वो विशालता है, जिसे हम शिव के रूप में संदर्भित करते हैं।



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