विज्ञान और आध्यात्मिकता ये दोनो विषय हमारे जीवन का एक अटूट अंग है, परंतु इन दोनों के मध्य एक दूसरे से स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। 

पृथ्वी की आयु का वैदिक विश्लेषण

विज्ञान और आध्यात्मिकता की ये लड़ाई इनके मध्य हमारी मानसिक अभिवृद्धि का ही परिचायक है। इन दोनो के प्रति हमारा विश्वास ही हमे इन्हे एक दूसरे से अत्यधिक श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिये प्रेरित करता है। वास्तव मे इन दोनो की सार्थकता अपने ही क्षेत्र मे है परन्तु जब ये दोनो एक दूसरे की महत्ता को कम करने का प्रयास करते है, तो वास्तव मे ये अपनी सार्थकता को ही धूमिल करने लगते है।            

पृथ्वी की आयु का वैदिक कैलकुलेशन  


विज्ञान का सम्बन्ध मानव के भौतिकतावादी सुखो से है,
 और उनके विकास से है। परन्तु अध्यात्म का सम्बन्ध मानव के आध्यात्मिकता उन्नति और उसके जीवन की परिष्कृत जीवनशैली से होता है, जो उसे आत्मबल प्रदान करती है। इसलिए इन दोनो विषयो के लिये हमारे अलग-अलग तर्क हो सकते है।

आज एक विषय जो मेरे मस्तिष्क मे काफी समय से है, जिसे इन दोनो के द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों की प्रमाणिकता पर परखने का प्रयास कर रहा हूँ। पृथ्वी की आयु कितनी है ? क्या कोई इसका सत्यापित प्रमाण दे सकता है शायद नही। सर्वप्रथम हम विज्ञान के अनुसार चलते है। विज्ञान मे भी इस विषय पर अलग-अलग मत है। 


काफी समय से विज्ञान इसका उत्तर देने का प्रयास कर रहा है। अलग-अलग समय पर वैज्ञानिको ने पृथ्वी की आयु अलग-अलग बताई है। आज इनके अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4,54,30,00,000 वर्ष है, जिसमे 5,00,00,000 वर्ष कम या ज्यादा हो सकती है। ये अभी पूर्ण रूप से प्रमाणित नही है। संभव है विज्ञान की उन्नति के साथ इसमे भी कुछ परिवर्तन किया जाय। 

अब अध्यात्मिक तथ्यों के आधार पर पृथ्वी की आयु जानने का प्रयास करें। अध्यात्मिक तथ्यों की एक विशेषता होती है वह समय की अवधि के साथ कभी नहीं बदलते हमेशा एक जैसे रहते हैं चाहे भूतकाल हो वर्तमान काल हो या भविष्य काल इनमें कोई परिवर्तन नहीं होता है। इसकी प्रमाणिकता आस्था और आध्यात्मिक विज्ञान का वह संयोग है, जो सृष्टि के प्रारंभ से एक जैसा है। जिसमें अभी तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ, उसका एक जैसा होना ही उसकी सबसे बड़ी प्रमाणिकता है। 

हिन्दू धर्म के अनुसार, चार युग होते है। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग इन युगो की आयु की भी समय अवधि होती है। ऐसे चार युगो को मिलाकर एक महायुग बनता है, और ऐसे 71 महायुगो को मिलाकर एक मन्वंतर बनता है, और ऐसे 14 मन्वंतरो को मिलाकर एक कल्प बनता है, जोकि ब्रह्मा जी का 1 दिन होता है। इन सब की भी आयु की एक समय अवधि होती है
                                                          

सतयुग की आयु : 17,28,000 वर्ष 
त्रेतायुग की आयु : 12,96,000 वर्ष 
द्वापरयुग की आयु : 8,64,000 वर्ष 
कलियुग की आयु : 4,32,000 वर्ष 
महायुग की आयु : 43,20,000 वर्ष
मन्वंतर की आयु:43,20,000 x 71 = 30,67,20,000 वर्ष
कल्प की आयु : 30,67,20,000 x 14 = 429,40,80,000 वर्ष 
यही इस सृष्टि की कुल आयु है। 


जिसमें वैज्ञानिकों द्वारा अनुमानित पृथ्वी की आयु की तरह कोई प्लस या माइनस नहीं है। अब हमारे पास दो तथ्य है। एक भौतिक विज्ञान का और दूसरा अध्यात्मिक विज्ञान का, भौतिक विज्ञान मनुष्य के विकास के अनुसार बदलता रहता है, उसमें कभी कुछ जुड़ता है और कभी कुछ घटता हैकिंतु आध्यात्मिक विज्ञान कभी नहीं बदलता वह हमेशा एक जैसा ही बना रहता है यही उसकी प्रमाणिकता है

अंत मे निष्कर्ष 

पृथ्वी जो हम सबको धारण करती है। शास्त्रों मे जिसे जीवन धारण कराने वाली कहा जाता है, इसलिये यह माता के सामान ही पूज्य है इस सृष्टि मे जो भी भौतिक स्वरूप मे दिखाई देता है उसका एक जीवन काल निश्चित होता है।इसलिये हमारी पृथ्वी की आयु भी निर्धारित है। 

पृथ्वी की आयु को लेकर काफी शोध हो चुके है जिस पर समय समय पर विद्वानों ने अपनी राय दी है। उसी प्रकार हमारे प्राचीन ऋषियों ने भी अपनी वैदिक गणितीय गणना के अनुसार पृथ्वी की आयु का निर्धारण किया है। हमारे पास दोनों तथ्य है, अब ये हमारे विवेक पर निर्भर करता है, की हम किसका अनुसरण करे, क्योकि पृथ्वी के अंत समय पर हममे से कोई भी उपस्थित नहीं होगा 

      



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