कृष्ण का कर्मयोग सिद्धांत पर उपदेश


निष्काम कर्म का महत्व, निस्वार्थ भाव का रहस्य, प्रेरक कर्म का अर्थ, ये सब भगवान कृष्ण द्वारा भगवद गीता में समझाया गया है। कर्म योग के सिद्धांत को समझने के लिये प्रतिदिन गीता का अध्ययन करना चाहिए। 


इससे ही वास्तविक ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। क्योकि जो जीवित हैं, उनके लिए गीता भी जीवित है। यह सम्पूर्ण कर्म सिद्धांत को जानने के लिए एक जीवित शास्त्र है। इसलिये इससे विशेष रूप से वर्तमान युग के लोगों को संबोधित किया जा सकता है।


कृष्ण द्वारा कर्मयोग का परिचय


मोह या लगाव, जो कुरुक्षेत्र मे अर्जुन के भ्रम का एकमात्र कारण था, जिसके लिये श्रीकृष्ण ने उसे आत्मानुशासन का एक अविभाज्य स्वरूप बताया, जिसके अहसास ने अर्जुन को अनन्त की स्वतंत्रता प्रदान की। परन्तु इससे अर्जुन के मन में एक शंका उत्पन्न हुई, कि इस अनंत की अवस्था को प्राप्त करने के बाद भी इस लहू लुहान कर्म में संलग्न रहने की क्या आवश्यकता है। 


श्रीकृष्ण ने यह कहकर इस संदेह को दूर कर दिया कि यद्यपि अनन्त के साथ एकता का एहसास अवश्य होता है, जिसे हम प्रकृति या प्रकृति के बल के माध्यम से प्राप्त करते है। साथ ही वह इस बात पर भी जोर देते है कि कार्रवाई में संलग्न रहने से पूर्णता प्राप्त नहीं होती है, लेकिन यदि सभी कार्यों को एक दिव्य भेंट के रूप में किया जाता है, जो बिना किसी लगाव और बलिदान की भावना के साथ किया जाता है, तो पूर्णता को प्राप्त किया जा सकता है। 


 


श्रीकृष्ण अर्जुन को स्वयं का उदहारण देकर समझाते हैं, उन्हे इस कर्म में संलग्न रहने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह वो सब कुछ प्राप्त कर सकते है जिसे वो प्राप्त करना चाहते है। इसलिये वह शांत और अपरिवर्तनीय आत्म में लीन ब्रह्म है। लेकिन दुनिया की भलाई के लिए और कर्म के सिद्धांत की रक्षा के लिए इस कर्म को करना आवश्यक है। 


इसलिए, कर्म करना न केवल पूर्णता को प्राप्त करने वाले के लिए बल्कि पूर्णता के लिए प्रयास करने वाले व्यक्ति के लिए भी अति आवश्यक है। यहाँ श्रीकृष्ण भारत के महान ऋषि-राजा, जनक के उदाहरण को उद्धृत करते हैं, जिन्होंने ईश्वर-प्राप्ति के बाद भी अपने राज्य पर शासन करना जारी रखा।


krishna ka karmyoga sidhant


अर्जुन इस सवाल को उठाते हैं कि मनुष्य ऐसे कार्यों को क्यों करता है जो उसके दिमाग को बदल देते हैं और उसे नीचता की ओर खींचने लगते हैं। श्री कृष्ण इसका जवाब देते हुऐ कहते हैं कि यह "इच्छा" ही है जो मनुष्य मे भेदभाव की भावना और उसकी समझ को खोने के लिए मजबूर करती है, और वह इस प्रकार गलत कार्य करने लगता है। 


इसलिये "इच्छा" ही सभी बुरे कार्यों का मूल कारण है। यदि इस "इच्छा" को हटा दिया जाये, तो मनुष्य मे दिव्यता अपनी पूर्ण महिमा के साथ प्रकट होती है और वह व्यक्ति को शांति, आनंद, प्रकाश और स्वतंत्रता प्रदान करती है।


अर्जुन का प्रश्न  


ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन ।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥

अर्थ : अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?॥

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे ।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌ ॥

अर्थ : आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ॥


श्री कृष्ण का उत्तर 

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌ ॥

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अर्थ :  श्रीभगवान कहते है - हे निष्पाप अर्जुन ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठाये, मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है॥

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥

अर्थ : मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (इस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात कोई फल उत्पन्न नहीं करते, इस अवस्था को ही 'निष्कर्मता' कहते है।) को या योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न ही अपने कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है॥

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥

अर्थ : यह निःसंदेह निश्चित ही है, कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र के लिये भी बिना कर्म को किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा उत्पन्न हुऐ कर्म करने को करने के लिए बाध्य है॥


कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥

अर्थ : जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है॥

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यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥

अर्थ : किन्तु हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त होकर समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वास्तव मे वही श्रेष्ठ है॥

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ॥

अर्थ :  इसलिये तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म को कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना अधिक श्रेष्ठ है तथा कर्म को न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी किसी प्रकार सिद्ध नहीं होगा॥

यह सम्पूर्ण प्रकृति तीन प्रकार के गुणों से बनी होती है: रज, तम और सत्व। परन्तु आत्मा इन तीन गुणों और उनके कार्यों से परे है। जब इस तथ्य का ज्ञान हो जाता तब ही व्यक्ति में पूर्णता आ जाती है। 



भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि प्रत्येक को अपनी प्रकृति के अनुसार ही अपना कर्तव्य करना चाहिए, और जब वह कर्तव्य जो किसी की प्रकृति के अनुकूल होने की स्थिति में होने पर वैराग्य के अनुकूल हो जाता है, तब वह उसे स्वयं पूर्णता की ओर ले जाता है।


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अंत में निष्कर्ष 


कर्म और कर्मयोग।


कर्म तीन प्रकार के होते हैं, सात्विक कर्म (बिना किसी लगाव और निःस्वार्थ भाव के साथ ), राजसिक कर्म (स्वयं के लिए स्वार्थ और लाभ की इच्छा), तामसिक कर्म (स्वार्थ और बर्बरता)। कर्म योग सर्वोच्च ईश्वर को प्राप्त करने का तरीका है। कर्म को अनासक्ति भाव के साथ करना बिना किसी लाभ और अपेक्षा के ही कर्मयोग है।


आपके लिये जो उपयुक्त हैं वही आपको मिलेगा।


कर्म दर्शन के अनुसार "आपको वही मिलता है जिसके आप हकदार होते हैं"। "आप जो भो बोते हैं उसे ही काटते हैं"। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मो और विचारों के लिए जिम्मेदार होता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का कर्म पूरी तरह से उसका खुद का उत्तरदायित्व है।


कर्म और भाग्य।


कृष्ण कहते है कर्म के द्वारा ही भाग्य का निर्माण संभव है, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र होकर अपने भाग्य का निर्माण करता हैं। वेदों के अनुसार भी, यदि कोई अच्छा कर्म करता है, तो उसे अच्छाई प्राप्त होगी, अगर कोई बुराई करता है, तो उसे बुराई ही प्राप्त होगी।


भगवान निष्पक्ष होते है।


कृष्ण ने कर्म के रूप को समझाते हुऐ कहा है, - "ईश्वर बिना किसी कारण के किसी को कष्ट नहीं पहुँचाता है और न ही वह बिना किसी कारण के किसी को खुश करता है। ईश्वर बहुत निष्पक्ष होता है और वह आपको वही देता है जिसके आप योग्य होते हैं।"





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