krishna ki 16 kalaye

क्या होती हैं कलाएं


कला को जब हम सामान्य शाब्दिक अर्थ के रूप में देखते है तो कला को एक विशेष प्रकार का गुण माना जाता है। यानिकी किसी चीज को उसके सामान्य रूप से हटकर सोचना, उसे समझना और कुछ खास अंदाज में सभी कार्यों को करना ही जो किसी भी वयक्ति को आम से खास बनाता हों उसे कला की श्रेणी में रखे जाता हैं। भगवान विष्णु ने जितने भी अवतार लिये उन सभी में कुछ न कुछ खासियते थी वे सभी खासियत ही उनकी कलाये कही जाती है। 


शास्त्रों में भगवान श्री कृष्ण को सम्पूर्ण अवतार माना गया है, उन्होंने अपने इस अवतार में सोलह कलाओ को धारण किया था।


श्री कृष्ण की 16 कलाएं का अर्थ


श्री संपदा – श्री संपदा इसका तात्पर्य है कि जिसके पास भी श्री संपदा होगी वह धनी होगा। धनी होने का अर्थ सिर्फ पैसा व पूंजी जोड़ने से नहीं है बल्कि इसका अर्थ है वह मनुष्य मन, वचन और कर्म से भी धनी होना चाहिये। अगर उसके पास कोई भी व्यक्ति आस लेकर आता है तो वह उसे अपने पास से कभी भी निराश नहीं लौटने देता। श्री संपदा से युक्त व्यक्ति के पास माता लक्ष्मी का सदैव स्थायी निवास बना रहता है। अतः कह सकते हैं की इस कला से संपन्न व्यक्ति सदैव समृद्धशाली रूप से अपना जीवनयापन करता है।


भू संपदा – इसका अर्थ यह है कि जो भी वयक्ति इस कला से युक्त होगा वह एक बड़े भू-भाग का स्वामी होगा, या उसका वह किसी बड़े भू-भाग पर अपना राज्य स्थापित करने की क्षमता को रखता होगा। इस तरह के गुण वाले व्यक्ति को भू कला से युक्त माना जाता है।


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कीर्ति संपदा – कीर्ति अथार्त ख्याति, प्रसिद्धि ऐसा वयक्ति देश और दुनिया में प्रसिद्ध होगा तथा वह लोगों के बीच काफी लोकप्रिय और विश्वसनीय माना जाता है। ऐसा वयक्ति जन कल्याण के कार्यों में हमेशा आगे रहता है। ऐसे गुण वाले व्यक्ति को कीर्ति संपदा कला से युक्त माना जाता है।


वाणी सम्मोहन – इस कला से संपन्न वयक्तियो की आवाज़ में एक अलग तरह का सम्मोहन होता है। जिससे लोग ना चाहते हुए भी उनके बोलने के कला की तारीफ करते हैं। ऐसे लोगो पर माता सरस्वती की विशेष कृपा होती है। इन्हें वचनो को सुनकर क्रोधी वयक्ति भी हो जाते है। ये अपनी वाणी कौशल के द्वारा लोगो के मन में भक्ति व प्रेम की भावना को जगा सकते है।



लीला – इस कला से युक्त व्यक्ति तेजस्वी और चमत्कारी होता है, उसके दर्शन करने से एक अलग तरह का आनंद प्राप्त होता है। श्री हरि विष्णु की कृपा से उन्हें कुछ खास शक्तिया मिलती हैं, जिनसे यह अनहोनी को होनी में और होनी को अनहोनी में बदलने की क्षमता रखते है। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन को हमेशा भगवान का दिया हुआ प्रसाद मानकर उसे ग्रहण करते हैं।


कांति – कांति वह दिव्य कला है, जिससे चेहरे पर एक अलग तरह का तेज़ दिखाई देता है, जिसे देखने मात्र से ही आप अपनी सुध-बुध को खोकर उसके आगे अपने आप को समर्पित कर देते हैं, और उसके रूप और सौंदर्य से आप इतने प्रभावित हो जाते हैं। की चाहकर भी आपका मन उनकी आभा से मुक्त होने का नहीं चाहता और आप उन्हें सिर्फ एकटक होकर निहारते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति को कांति कला से युक्त कहा जाता है।


विद्या – विद्या भी एक प्रकार की उत्तम कला है जिसके पास भी विद्या की शक्ति होती है उसमें अनेको गुण अपने आप ही आ जाते हैं। विद्या कला से संपन्न व्यक्ति सभी वेदों शास्त्रों का पूर्ण ज्ञाता, संगीत और कला का जानकर, युद्ध कला और रणनीति में पूर्ण रूप से पारंगत तथा राजनीति के दाव पेंच व कूटनीति में भी पूर्ण माहिर होता है।


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विमला – विमल यानि छल-कपट और भेदभाव से पूर्ण रूप से रहित एकदम निष्पक्ष जिसके मन में किसी भी प्रकार कोई मैल ना हो कोई भी दोष न हो तथा जो आचार विचार और व्यवहार से बिलकुल निर्मल हो ऐसे व्यक्तित्व का धनी वयक्ति ही विमला कला से युक्त माना जाता है।


उत्कर्षिणि शक्ति कला – उत्कर्षिणि का शाब्दिक अर्थ होता है जिसके अंदर किसी को भी प्रेरित करने क्षमता हो जो लोगों को कर्म का मार्ग दिखा सके। जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने युद्धभूमि में अपने हथियार डाल चुके अर्जुन को गीता का उपदेश देकर कर्म करने के लिये प्रेरित किया था। इस प्रकार की क्षमता रखने वाला व्यक्ति ही उत्कर्षिणि शक्ति या इस कला से संपन्न माना जाता है।


नीर-क्षीर विवेक –  इस कला से युक्त व्यक्ति ऐसा ज्ञान रखता है जो अपने ज्ञान के द्वारा न्यायोचित फैसले लेता हो इस कला से संपन्न माना जाता है। ऐसे व्यक्ति विवेकशील तो होता ही है साथ ही साथ वह अपने विवेक से लोगों को सही मार्ग सुझाने में भी पूर्ण रूप से सक्षम होते है।



कर्मण्यता – इस कला से युक्त वयक्ति सिर्फ कर्म के सिद्धांत को ही मानता है वह दुसरो को कर्म का उपदेश देने के साथ साथ स्वयं भी कर्मठ होता है।


योगशक्ति – योग भी एक कला है। योग का साधारण शब्दों में अर्थ होता है जोड़ना यहां पर इसका आध्यात्मिक अर्थ आत्मा को परमात्मा से जोड़ने के लिये है। इस कला से संपन्न व्यक्ति बेहद आकर्षक होते हैं और अपनी इस कला से दूसरों के मन पर हमेशा राज करते हैं।


विनय – इस कला का अर्थ है विनयशीलता अर्थार्त जिसमे अहंकार का भाव न हो। चाहे वह कितना ज्ञानवान हो, धनवान हो या बलवान हो मगर उसे अहंकार छू भी नहीं सकता। 


सत्य को धारण करना  – सत्य बहुत कड़वा होता है इसलिये सत्य को ग्रहण करना हर किसी के बस में नहीं होता ऐसे बहुत ही कम विरले होते हैं जो सत्य का मार्ग अपनाते हैं और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ते। इस कला से संपन्न व्यक्तियों को सत्यवादी कहा जाता है। 


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आधिपत्य – इस कला से संपन्न वयक्ति ऐसा प्रभावशाली होता है कि लोग स्वयं ही उसका आधिपत्य स्वीकार कर लेते हैं। और उन्हें उसके आधिपत्य में सुरक्षा का अहसास होता है।


अनुग्रह कला  – जिसमें अनुग्रह की कला होती है ऐसा वयक्ति हमेशा दूसरों के कल्याण के विषय में ही सोचता रहता है, वह सदा परोपकार के कार्यों में ही लगा रहता है। उनके पास जो भी सहायता के लिये जाता है वह अपने सामर्थ्यानुसार उस व्यक्ति की सहायता अवश्य करता हैं।



अंत में निष्कर्ष 


जिस भी वयक्ति में ये सभी कलाएं अथवा इस तरह के गुण होते हैं, वह ईश्वर के समान ही पूज्य होता है। क्योंकि किसी भी इंसान के वश में इन सभी गुणों को एक साथ धारण करना संभव नहीं होता है, कोई भी साधारण वयक्ति केवल तीन से चार कलाओ को ही धारण कर सकता है, केवल ईश्वर ही दस या उससे अधिक कलाओ को धारण कर सकते है।




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