ज्योतिष एक प्राचीन विधा है, जो समय-समय पर नये-नये रूपों मे सामने आती रही है। भारतीय ज्योतिष के अलग-अलग रूपों मे एक रूप लाल किताब का है जो वैदिक ज्योतिष से एक दम अलग है। इन दोनों के सिद्धांतो मे बहुत अंतर है। जहाँ वैदिक ज्योतिष में लग्न राशि को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है, वही इसके विपरीत लाल किताब मे लग्न राशि का कोई महत्व नहीं होता। 

लाल किताब ज्योतिष एक रहस्य

लाल किताब के अनुसार कुंडली मे लग्न हमेशा मेष ही होता है, और वही खाना नंबर एक या पहला भाव कहा जाता है। लाल किताब का गणित भी एकदम अलग है, जहाँ हम वैदिक ज्योतिष में वर्ग कुंडली, नवांश, दशंमाश आदि के आधार पर फलादेश को निकालने का प्रयास करते है, वहीं लाल किताब के अनुसार अंधी कुंडली, अंधराती कुंडली, नाबालिग कुंडली आदि के आधार पर कुंडली को बनाकर भविष्यफल निकला जाता है।

लाल किताब मे वर्षफल को वैदिक ज्योतिष की अपेक्षा अधिक महत्व दिया जाता है। वैदिक ज्योतिष के विपरीत लाल किताब में उपायों से अधिक महत्व सावधानी और सिद्धांत को दिया जाता है। वैदिक ज्योतिष के सभी उपाय जहाँ सिद्धांत, गणित और ज्ञान पर आधारित होते है, वही लाल किताब का ज्ञान लोक प्रचलित अनुभवों, सिद्धांतो, सावधानी और उपायों पर आधारित होता है। 

लाल किताब के अनुसार कुंडली मे भावों का महत्व 


वैदिक ज्योतिष में हम कुंडली के ग्रह, राशि तथा उसके नक्षत्रों के आधार पर गणना करके प्राप्त करते है वही लाल किताब में सामुद्रिक शास्त्र और वास्तु शास्त्र के आधार पर गणना करके भविष्य फल प्राप्त किया गया है। मूलत: लाल किताब को हम हस्तरेखा पर आधारित किताब मान सकते है।

लाल किताब - पहला भाव 


लाल किताब के अनुसार पहला भाव जातक के स्वास्थ्य, साहस, पराक्रम, उसके कार्य करने की क्षमता, हर्ष, दुःख, शरीर, गला, राजकीय या सरकारी कार्य क्षेत्र को दर्शाता है। लाल किताब में पहले भाव को सभी बारह भावों का राजा माना जाता है और उसके विपरीत सप्तम भाव को गृह मंत्री माना जाता है। पहले भाव में एक से अधिक ग्रहों का स्थित होना अच्छा नहीं माना जाता है। क्योंकि इससे जातक के से दिमाग में भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। पहले भाव में केवल एक ही ग्रह हो, तो यह स्थिति जातक के लिए बहुत बेहतर होती है।  


लाल किताब - दूसरा भाव 


लाल किताब के अनुसार दूसरे भाव को ससुराल पक्ष और उनके परिवार, धन, सोना, खजाना, अर्जित धन, धार्मिक स्थान, गौशाला, कीमती पत्थर और परिवार की स्थिति को दर्शाता है। लाल किताब के अनुसार, कुंडली मे दूसरे भाव की सक्रियता के लिए नोवै या दशवे भाव में किसी भी एक ग्रह को उपस्थित होना चाहिए। यदि नोवै और दशवे भाव में कोई ग्रह नहीं है तो दूसरे भाव को निष्क्रिय माना जाता है, फिर चाहें कोई शुभ ग्रह भी इस भाव में क्यों ही ना बैठा हुआ हो।

लाल किताब - तीसरा भाव 


लाल किताब के अनुसार, तीसरा भाव जातक की कुंडली मे भाई-बहन, समझौता, हाथ, कलाई, युद्ध क्षेत्र, रिश्तेदार और घर की साज-सज्जा को दर्शाता है। लाल किताब के अनुसार मंगल ग्रह तीसरे भाव का कारक होता है, लेकिन बुध ग्रह भी इस भाव को नियंत्रित करता है। इसलिए व्यक्ति पर इन दोनों ग्रहों का मिश्रित प्रभाव देखने को मिलता है। यह भाव नोवै भाव के स्वामी और ग्यारवे भाव के स्वामी के माध्यम से सक्रिय होता हैं। यदि किसी कुंडली मे ये दोनों भाव खाली हो तो तीसरा भाव निष्क्रिय या सामान्य माना जाता है, तब यह किसी प्रकार का फल प्रदान नहीं करता।

लाल किताब - चौथा भाव 


लाल किताब के अनुसार चौथा भाव आपके ननिहाल पक्ष, माँ के माता-पिता, जमीन, वाहन, धन और लक्ष्मी स्थान को दर्शाता है। इस भाव का स्वामी चंद्रमा को कहा गया है, इसलिए यह जल से संबंधित सभी वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करता है। चंद्रमा को माँ का कारक गृह कहा गया है, इसलिए यदि कुंडली के चतुर्थ भाव में कोई भी ग्रह स्थित होता है तो, वह अच्छा फल देता है। चौथे और दशवे भाव में स्थित ग्रह एक-दूसरे के साथ अच्छे संबंध बनाते हैं। 

लाल किताब - पांचवा भाव 


लाल किताब के अनुसार पांचवे भाव को संतान, पुत्र, ज्ञान, यंत्र-मंत्र-तंत्र, स्कूल और उच्च शिक्षा के रूप मे देखा जाता है। लाल किताब के अनुसार बृहस्पति इस भाव का करक ग्रह है जिसे भूमि का स्वामी माना जाता है परन्तु कालपुरुष की कुंडली मे यहाँ पांचवी राशि आती है जिसका स्वामी सूर्य होता है इसलिये सूर्य को भी इस घर का स्वामी माना गया है। दशवे भाव का स्वामी शनि होता है इसलिये दशवे भाव में स्थित ग्रह पांचवे भाव में बैठे हुए ग्रह पर अपना नकारात्मक प्रभाव डालते है। पांचवे भाव की नोवै भाव पर दृष्टि रहती है और इससे ही यह सक्रिय रहता है। यदि ग्यारहवे भाव में कोई ग्रह स्थित न हो तो, तो पंचम भाव निष्क्रिय या तटस्थ बना रहता है।


लाल किताब - छठा भाव 


लाल किताब के अनुसार छठा भाव कुंडली मे शत्रु, मामा, दादा से संबंधित होता है। यदि दूसरे और बारहवे भाव में कोई ग्रह नहीं है और छठे भाव में कोई ग्रह है, तो भी यह भाव हमेशा निष्क्रिय बना रहता है। छठे भाव में स्थित ग्रह बारहवे भाव में बैठे ग्रह को सक्रिय करता है। यह भाव पीठ, भूमि के नीचे, कमर, शत्रु, मामा, मौसी, भूरा रंग, भतीजा, बहन और बहनोई आदि को दर्शाता है। लाल किताब के अनुसार भी इस भाव का कारक ग्रह मंगल है। 

लाल किताब - सातवां भाव 


लाल किताब के अनुसार, कुंडली में सातवां भाव जातक के परिवार, जीवनसाथी, जन्मस्थान, आदि को बताता है। यहाँ एक सिद्धांत यह कहता है कि सातवे भाव में बैठे ग्रह पहले भाव में स्थित ग्रहों के द्वारा संचालित होते हैं। इसको हम सरल भाषा में समझें तो, पहले भाव में ग्रहों की अनुपस्थिति होने पर सातवें घर में जो भी ग्रह होंगे वे निष्क्रिय और प्रभावहीन बने रहगे। लाल किताब के अनुसार सातवे भाव में केवल मंगल और शुक्र का प्रभाव ही देखने को मिलता है। 

लाल किताब - आठवां भाव 


लाल किताब के अनुसार, जातक की कुंडली में आठवां भाव उसकी मृत्यु, बीमारी, शत्रु, आदि को दर्शाता है। यदि कालपुरुष की कुंडली के दूसरे भाव में कोई भी ग्रह उपस्थित नहीं है तो आठवे भाव में स्थित ग्रहों का प्रभाव भी शून्य हो जाता है। यदि आठवां भाव और पहले भाव में स्थित ग्रह एक-दूसरे के मित्र हैं तो जातक दूर की सोचता है और यदि वे ग्रह एक दूसरे के शत्रु हुए तो जातक जीवनभर बिना लक्ष्य के ही भटकता रहता है। लाल किताब के अनुसार भी इस भाव का कारक ग्रह शनि है। 



लाल कताब - नवम भाव 


लाल किताब के अनुसार, यह भाव पिता, दादा, भाग्य, धर्म, कर्म, बड़ा घर, परिवार के बड़े व्यक्ति, पुराने घर से प्राप्त धन या विरासत को दर्शाता है। कुंडली के नवम भाव के द्वारा जातक के जीवन में समृद्धि और खुशहाली को भी देखा जाता है। यदि तीसरे और पांचवें भाव में कोई ग्रह नहीं है तो इस भाव पर स्थित ग्रह निष्क्रिय हो जाते है। पांचवें भाव में ग्रह की उपस्थिति ही इस भाव को सक्रिय बनाती है। लाल किताब के अनुसार इस भाव का कारक ग्रह बृहस्पति है। 

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लाल किताब - दशम भाव 


लाल किताब के अनुसार, दशम भाव जातक का सरकार के साथ संबंध, पिता के दुखों, ख़ुशियाँ और प्रॉपर्टी को दर्शाता है। यह भाव पिता का घर, पिता से मिलने वाली ख़ुशियाँ, चतुराई, काला रंग तथा अंधेरा कमरा आदि को दर्शाता है। इस भाव में स्थित ग्रह, पंचम भाव में बैठे ग्रह के प्रभाव को नगण्य करते हैं। कुंडली में दूसरा भाव इस भाव को सक्रिय बनाता है। लाल किताब के अनुसार इस भाव के कारक ग्रह बृहस्पति और शनि है।

लाल किताब - ग्याहरवां भाव 


लाल किताब के अनुसार भी जातक की कुंडली मे ग्यारहवां भाव आपकी आमदनी, पड़ोसी, लाभ, अदालत, न्यायाधीश के आसन को दर्शाता है। तीसरे भाव में बैठे ग्रह ग्यारहवें भाव में स्थित ग्रहों को सक्रिय करते हैं। कुंडली मे ग्यारहवें भाव में स्थित ग्रह की दशा का प्रभाव जातक के लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का हो सकता है। हालाँकि दशा की समाप्ति पर जातक पर उस ग्रह का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। लाल किताब के अनुसार भी इस भाव का कारक ग्रह बृहस्पति है।

लाल किताब - बाहरवां भाव


लाल किताब के अनुसार, कुंडली में बारहवें भाव से हम ख़र्चे, बेडरूम से सटा हुआ पड़ोसी का घर और मित्रों का सुख-दुख आदि को देखते है। इस भाव में स्थित ग्रह कुंडली के छठे भाव में बैठे हुऐ ग्रहो से सक्रिय होते हैं। लाल किताब के अनुसार इस भाव का कारक ग्रह शनि है।

अंत मे निष्कर्ष


लाल किताब के बारे मे ऐसा बहुत से लोगो का मत है की यह अरुण संहिता पर आधारित है। जिसे रावण ने अरुण से प्राप्त कर रावण संहिता के नाम से लिखा था। हालांकि इसका कोई प्रमाणित तथ्य नहीं है। इसके विपरीत कुछ ज्योतिष विद्वानों का मानना है कि लाल किताब पराशर संहिता पर आधारित है जिसे ऋषि पराशर ने काल नियम पर आधारित करके लिखा था। इसलिये पराशर संहिता को ही असल में ज्योतिष विद्वानों द्वारा एकमात्र सही ग्रंथ माना गया है। 




 

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