शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम। 
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।। 

भगवान विष्णु ने क्यों लिया मत्स्य अवतार इसकी कथा

भगवान विष्णु जो जगत के पालनहार है, जो सृस्टि की रचना, पालन और संहार करते है। उनकी ये कथाऐ हमे ये विश्वास दिलाती हे की जब भी हम संकट मे होते हे ओर जब हम उन्हे दिल से पुकारते हे वो किसी ना किसी रूप मे प्रगट होकर हमारी सहायता करते है। आज मे आपको भगवान के सबसे पहले अवतार की कथा बता रहा हु, ये शायद आपको पता भी हो, भगवान ने सबसे पहले मत्स्य के रूप मे अवतार लेकर पृथ्वी पर जीवन की रक्षा की थी।  

मत्स्य अवतार का कारण

पौराणिक साहित्य मे भगवान के मत्स्य अवतार से सम्बंधित दो कथाओ का वर्णन मिलता है। एक कथा दैत्यों के राजा हयग्रीव से सम्बंधित है और दूसरी राजा सत्यव्रत से सम्बंधित है जो शायद अलग-अलग कल्प या मन्वंतर मे श्री भगवान द्वारा एक ही रूप मे लिये गये अवतार द्वारा सृस्टि की रक्षा करने का वर्णन है। इसलिए इस लेख मे दोनों कथाओ का वर्णन किया है।

हयग्रीव दैत्य का भगवान द्वारा वध 

एक समय दैत्यों के राजा हयग्रीव ने अपनी शक्ति के अहंकार मे चूर होकर भगवान ब्रह्मा से चारो वेदो को चुरा कर समुंद्र मे छिपा दिया था। चारो वेदों के इसप्रकार अपहरण के कारण समस्त लोको का ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया तथा पाप व अधर्म का विस्तार होने लगा। तब भगवान श्री विष्णु ने चारो वेदों की रक्षा और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया था और चारो वेदों की रक्षा की। 

सत्यव्रत को मत्स्य के रूप में दर्शन 

दूसरी कथा के अनुसार सृस्टि के अंत समय होने वाली प्रलय से श्री हरि ने मत्स्य रूप मे राजा सत्यव्रत और सप्तऋषियों की प्रलय के जल से रक्षा की थी। उस समय सत्यव्रत नाम के एक धर्मात्मा राजा राज्य किया करते थे। वे बड़े धर्म परायण और पुण्यात्मा राजा थे परंतु उन्हे अपने राज वैभव और ऐश्वर्य का अहंकार था। 


एक दिन प्रात काल राजा सत्यव्रत नदी मे स्नान कर रहे थे जैसे ही उन्होने हाथो की अंजुलियों मे जल भरकर सूर्य देवता को अर्घ्य अर्पित करने लगे तभी उन्हे एक आवाज सुनाई दी जो एक छोटी सी मछली की थी, जो जल के साथ उनकी अंजुली मे आ गई थी। मछली ने राजा से आग्रह किया! हे राजा मुझे वापस नदी के जल मे मत छोड़ना क्योकि जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। इसलिए मेरे प्राणो की रक्षा करो अब मै तुम्हरी शरण मे हूँ, मेरी रक्षा करना तुम्हारा धर्म है। 

भगवान विष्णु ने क्यों लिया मत्स्य अवतार इसकी कथा

राजा ने छोटी मछली की बातो से द्रवित हो उसकी रक्षा का वचन देते हुए कहा! हे मत्स्य अब तुम्हे भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं हम तुम्हे अपने राजमहल मे स्थान देगे। तब मछली ने पुनः राजा से कहा! हे राजा क्या मेरे लिए तुम्हारे राजमहल मे पर्याप्त स्थान है। राजा सत्यव्रत हसने लगे और उन्होने उस मछली को क्षुद्र जीव कहकर उसका उपहास किया और अपने राजमहल की विशालता का वर्णन करने लगे। 

राजा ने उस मछली को अपने राजमहल मे लाकर जल से भरे एक छोटे पात्र मे रख दिया तथा अपने सेवको को आदेश देकर उस मछली के आहार का प्रबंध करने को कहा। तब उस मछली के रूप मे श्री हरि ने एक ही रात मे अपना शरीर इतना बढ़ा लिया की वो पात्र रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। अगले दिन मछली राजा सत्यव्रत से पुनः बोली- "हे राजन! मुझे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान दीजिये, यह स्थान मेरे लिए पर्याप्त नहीं है तब राजा सत्यव्रत ने उस मछली को पानी से भरे दूसरे बड़े पात्र में रख दिया।

परंतु पुनः मछली का शरीर रात भर में इतना बढ़ गया कि वो पात्र भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ने लगा। जैसे राजा सत्यव्रत उस मत्स्य को किसी बड़े पात्र मे रखते वो पात्र भी छोटा पड़ जाता। राजा सत्यव्रत मछली के निरन्तर विस्तार से अचंभित थे। मछली ने राजा को अचंभित देखकर कहा! हे राजा आप क्यों चिंता करते है आपका राजमहल तो बहुत बड़ा है। राजा सत्यव्रत को अपनी भूल समझ मे आ गयी की उन्होने उस छोटी मछली को क्षुद्र जीव कहा था और अपने राजमहल की विशालता पर अभिमान किया था। 


राजा ने अपनी भूल के लिये उस मछली से क्षमा मांगी और उसे एक बड़ी नदी मे पंहुचा दिया परन्तु उस मछली के बढ़ते आकर के कारण वो नदी भी छोटी पड़ गयी। राजा सत्यव्रत समझ गए यह भगवान श्री हरि ही है जो अपनी माया से उन्हे भ्र्मा रहे है।तब सत्यव्रत बोले! हे अविनाशी अच्युत भगवान विष्णु आप दया कर मुझे अपने साकार रूप मे दर्शन दे और अपनी इस अद्धभुत लीला का रहस्य बताये।
                                                                 

तब श्री हरी अपने चतुर्भुज रूप मे दर्शन देकर बोले! हे सत्यव्रत आज से सात दिन बाद ये समस्त भूलोग प्रलय के जल मे डूब जायगा इसलिए तुम सप्तऋषियों के साथ समस्त प्राणियों के सूक्ष्म शरीरो और सभी वनस्पतियों के बीजो को लेकर एक बड़ी नौका मे बैठ जाना। तब मे इसी मत्स्य रूप मे तुम्हारे पास आऊगा तुम वासुकि नाग से उस नौका को मेरे सींग से बांध देना फिर जब तक प्रलय काल की अंधी रहेगी मै तुम्हे लेकर विचरण करता रहुगा और तुम्हे ज्ञान का उपदेश दूंगा। जब प्रलय समाप्त हो जाएगी तब तुम वैवस्वत मनु के रूप मे एक मन्वन्तर तक सृस्टि का संचालन करोगे। भगवान श्री हरि के वचन अनुसार सातवे दिन प्रलय मे सब डूब गया और भगवान ने मत्स्य के रूप मे आकर सत्यव्रत की रक्षा की। 

भगवान विष्णु ने क्यों लिया मत्स्य अवतार इसकी कथा

मत्स्य रूपी भगवान श्री हरि से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो गया। वह भगवान के वास्तविक स्वरूप जो सभी प्राणियों में निवास करता जिसके लिए ना कोई ऊँच है, ना कोई नीच जो सभी प्राणियों के लिये एक समान हैं जिसके बिना यह सम्पूर्ण जगत् नश्वर है और इस नश्वर जगत् में भी उनके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है और अंत में सब कुछ उन्ही में मिल जाता है। इस रहस्य को जानकर सत्यव्रत जीवन से मुक्त हो गए। प्रलय की आंधी शांत होने के पश्चात श्री हरि ने सत्यव्रत को वैवस्वत मनु के रूप मे एक मन्वन्तर तक सृस्टि संचालन का वरदान दिया। 

अंत मे निष्कर्ष 

भगवान विष्णु को सभी देवताओ मे सबसे अधिक पूज्य माना जाता है। जो सबसे अधिक दयालु और तुरंत कृपा करने वाले होते है, उनका यही सरल स्वभाव ही है, जो वो इसी प्रकार समय-समय पर अवतरित होकर दुष्टो का विनाश, धार्मिक मनुष्यो की रक्षा और धर्म की स्थापना करते है।



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